रांची, 23 सितंबर: झारखंड में प्रकृति, संस्कृति और भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक करमा पर्व मंगलवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। गांवों से लेकर शहरों तक करम अखाड़े सजाए गए। पारंपरिक वेशभूषा में युवक-युवतियों और महिलाओं ने मांदर, ढोल और नगाड़े की थाप पर करमा गीतों के साथ नृत्य कर उत्सव का आनंद लिया। रांची समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों में करम डाल की पूजा-अर्चना की गई।
भादो शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाए जाने वाले इस पर्व में करम वृक्ष की डाल और जावा का विशेष महत्व है। कई स्थानों पर पर्व की तैयारियां करीब एक सप्ताह पहले शुरू हो गई थीं। जावा में विभिन्न अनाजों के बीज बोकर उनकी पूजा की गई। पर्व के दिन करम डाल को अखाड़े या पूजा स्थल पर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की गई। बहनों ने भाइयों की सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की कामना की।
पूजा के बाद अखाड़ों में देर रात तक करमा नृत्य और लोकगीतों का दौर चलता रहा। मांदर की थाप के साथ कदम से कदम मिलाकर युवक-युवतियां पारंपरिक नृत्य करते नजर आए। लोकगीतों में प्रकृति, खेती-किसानी, सामाजिक जीवन और आपसी रिश्तों की झलक देखने को मिली।
करमा पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि झारखंड की सामुदायिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। झारखंड सरकार के अनुसार करमा पर्व करम देवता की पूजा से जुड़ा है और इस दौरान समूह में गीत-संगीत और नृत्य की परंपरा रही है।
पर्व ने एक बार फिर प्रकृति संरक्षण, भाई-बहन के प्रेम, आपसी सहयोग और सामाजिक एकजुटता का संदेश दिया। करम अखाड़ों में उमड़ी भीड़ और मांदर की गूंज ने झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश की।