रांची, 31 अगस्त: राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में रविवार को आदिवासी एकता महाजुटान का आयोजन किया गया। प्रस्तावित परिसीमन, आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकारों, जल-जंगल-जमीन और खनिज संसाधनों से जुड़े मुद्दों को लेकर झारखंड के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग जुटे। महाजुटान में नेताओं ने आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने का आह्वान किया।
महाजुटान के मंच पर कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के. राजू, मध्य प्रदेश से आए आदिवासी नेता विक्रांत भूरिया, मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, विधायक प्रदीप यादव, राजेश कच्छप, सुरेश बैठा, नमन विक्सल कोंगाड़ी समेत कई नेता मौजूद रहे। नेताओं की मौजूदगी में आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत बनाए रखने की मांग उठाई गई।
महाजुटान में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर सबसे ज्यादा चिंता जताई गई। वक्ताओं ने कहा कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने की स्थिति में झारखंड में आदिवासी आरक्षित सीटों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। नेताओं ने मांग की कि वर्तमान में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में किसी प्रकार की कमी नहीं की जाए और यदि लोकसभा एवं विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ती है तो उसी अनुपात में एसटी आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ाई जाए।
मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने परिसीमन को केवल चुनावी मुद्दा नहीं बताते हुए इसे आदिवासी समाज के भविष्य और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा विषय बताया। उन्होंने आदिवासी समाज से अपने अधिकारों के लिए एकजुट रहने की अपील की।
पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि परिसीमन केवल लोकसभा और विधानसभा की सीटों का मामला नहीं है, बल्कि यह आदिवासियों के राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर करने का कोई भी प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई को गांव-गांव तक ले जाने का आह्वान किया।
महाजुटान में खन-खनिज संशोधन कानून, पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून, आदिवासी भूमि की सुरक्षा, विस्थापन और पलायन जैसे मुद्दे भी उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
महाजुटान के माध्यम से आयोजकों ने केंद्र सरकार तक यह संदेश देने का प्रयास किया कि परिसीमन की प्रक्रिया में झारखंड की सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों के साथ आदिवासी समाज के राजनीतिक एवं संवैधानिक हितों को भी विशेष महत्व दिया जाए।