मिडिल ईस्ट तनाव का असर रसोई तक, तेल-दाल से लेकर TV-Fridge तक महंगे

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नई दिल्ली, 24 मई: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर अब आम लोगों की जेब पर साफ दिखने लगा है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के बाद अब खाद्य तेल, दाल, गैस, परिवहन और इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कीमतें भी बढ़ने लगी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो महंगाई और तेज हो सकती है।

भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में ईरान-इजरायल और खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। इसका सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ रहा है।

हाल के दिनों में देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तीसरी बार बढ़ोतरी की गई है। दिल्ली में पेट्रोल 99.51 रुपये और डीजल 92.49 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया है। तेल कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे क्रूड के कारण लागत बढ़ रही है।

डीजल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ रही है, जिसका असर सब्जी, फल, दाल और खाद्य तेल की कीमतों पर पड़ रहा है। थोक कारोबारियों के अनुसार कई राज्यों में खाद्य तेलों के दाम में 5 से 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दालों और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की कीमतों में भी धीरे-धीरे इजाफा हो रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत एलपीजी और खाद्य तेलों के आयात के लिए भी काफी हद तक विदेशी बाजारों पर निर्भर है। ऐसे में डॉलर मजबूत होने और समुद्री परिवहन महंगा होने से घरेलू बाजार प्रभावित हो रहा है।

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से प्लास्टिक, पैकेजिंग और केमिकल उद्योग की लागत भी बढ़ रही है। इसका असर इलेक्ट्रॉनिक सामानों जैसे TV, फ्रिज, AC और वॉशिंग मशीन पर पड़ सकता है। उद्योग संगठनों के मुताबिक कंपनियां आने वाले महीनों में कीमतों में 3 से 8 प्रतिशत तक बढ़ोतरी कर सकती हैं।

क्रिसिल की रिपोर्ट में कहा गया है कि टायर, पेंट, पैकेजिंग, सिंथेटिक टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर पर कच्चे तेल की कीमतों का सीधा असर पड़ता है।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार यदि मिडिल ईस्ट संकट लंबा चला तो भारत में खुदरा महंगाई दर पर दबाव और बढ़ सकता है। रिजर्व बैंक ने भी माना है कि ऊंचे क्रूड ऑयल दाम से आयातित महंगाई बढ़ने का खतरा है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि तेल महंगा होने से सिर्फ ईंधन ही नहीं, बल्कि परिवहन, निर्माण, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत भी बढ़ती है। इसका असर अंततः आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है।