झारखंड में गहराया बालू संकट, 444 घाटों में सिर्फ 13 से हो रहा उठाव

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टेंडर और पर्यावरण मंजूरी में देरी से निर्माण कार्य प्रभावित, तीन गुना तक बढ़े दाम

रांची, 24 मई: झारखंड में बालू संकट लगातार गहराता जा रहा है। राज्य के 444 बालू घाटों में से फिलहाल केवल 13 घाटों से ही बालू उठाव हो पा रहा है। टेंडर प्रक्रिया, पर्यावरण स्वीकृति और लीज फाइनल होने में देरी के कारण वैध खनन लगभग ठप पड़ गया है। इसका सीधा असर निर्माण कार्यों और आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है।

जानकारी के अनुसार कैटेगरी-2 के 444 बालू घाटों में से 145 घाटों का अब तक टेंडर नहीं हो सका है। वहीं 299 घाटों की नीलामी होने के बावजूद सिर्फ 35 घाटों को पर्यावरण मंजूरी मिली है और मात्र 13 घाटों की लीज प्रक्रिया पूरी हो सकी है। ऐसे में राज्य के 95 प्रतिशत से अधिक घाट अब भी कागजी प्रक्रिया में फंसे हुए हैं।

बालू की कमी का फायदा अवैध खनन करने वाले माफिया उठा रहे हैं। कई जिलों में नदियों से खुलेआम अवैध खनन और परिवहन जारी है। रांची में 100 सीएफटी बालू की कीमत 4800 से 5500 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि पश्चिमी सिंहभूम में यही कीमत 7000 रुपये तक बताई जा रही है। पहले यही बालू 2000 से 2500 रुपये में मिल जाता था।

बालू संकट का असर मकान निर्माण, सड़क, पुल-पुलिया और सरकारी योजनाओं पर भी दिखने लगा है। प्रधानमंत्री आवास योजना सहित कई निर्माण कार्यों की गति धीमी पड़ गई है। निर्माण एजेंसियों और छोटे ठेकेदारों को समय पर बालू नहीं मिलने से लागत 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गई है।

खनन विभाग के अनुसार कई जिलों में लीज एग्रीमेंट की फाइलें अब भी लंबित हैं। दुमका, खूंटी, रामगढ़, रांची, हजारीबाग, गोड्डा, लातेहार और पूर्वी सिंहभूम में कई घाटों की स्वीकृति प्रक्रिया अधूरी है। वहीं गिरिडीह, कोडरमा और जामताड़ा जैसे जिलों में अब तक एक भी घाट का टेंडर पूरा नहीं हो पाया है।

उधर, सरकार ने अवैध खनन पर कार्रवाई तेज करने के संकेत दिए हैं। गढ़वा में प्रशासन ने अवैध बालू परिवहन के मामले में करीब 150 ट्रैक्टर मालिकों के खिलाफ वारंट जारी किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही लीज और पर्यावरण स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो आने वाले दिनों में राज्य में बालू संकट और गहरा सकता है, जिससे सरकारी राजस्व के साथ-साथ विकास कार्यों पर भी असर पड़ेगा।