रांची, 4 अप्रैल: झारखंड में पुलिस महानिदेशक तदाशा मिश्रा की नियमित नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार और हेमंत सोरेन की राज्य सरकार के बीच विवाद और गहराता जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार को कई पत्र भेजकर इस नियुक्ति को असंवैधानिक और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के विरुद्ध बताया है, जबकि राज्य सरकार अपनी पुलिस सेवा नियमावली में संशोधन कर नियुक्ति को वैध ठहराने पर अड़ी हुई है।
तदाशा मिश्रा (1994 बैच आईपीएस, झारखंड कैडर) झारखंड की पहली महिला डीजीपी हैं। नवंबर 2025 में अनुराग गुप्ता के वीआरएस लेने के बाद उन्हें कार्यवाहक डीजीपी बनाया गया। 30 दिसंबर 2025 को (रिटायरमेंट से महज एक दिन पहले) राज्य सरकार ने नियमावली संशोधित कर उन्हें दो वर्ष के लिए नियमित डीजीपी नियुक्त कर दिया।
केंद्रीय गृह मंत्रालय और यूपीएससी का कहना है कि तदाशा मिश्रा 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। इसलिए उनकी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले तथा तेलंगाना संबंधी हालिया फैसले का उल्लंघन है। यूपीएससी ने स्पष्ट पत्र में कहा है कि सेवानिवृत्त अधिकारी को नियमित डीजीपी नहीं बनाया जा सकता और पैनल बनाने की प्रक्रिया यूपीएससी के माध्यम से होनी चाहिए।
गृह मंत्रालय ने न केवल तदाशा मिश्रा बल्कि पिछले तीन डीजीपी नियुक्तियों पर भी आपत्ति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में सभी राज्यों को एक माह के अंदर यूपीएससी पैनल के माध्यम से डीजीपी नियुक्ति पूरी करने का निर्देश दिया था, जिसके बाद झारखंड पर भी दबाव बढ़ गया है।
झारखंड सरकार का तर्क है कि डीजीपी नियुक्ति राज्य का आंतरिक प्रशासनिक मामला है। नियम संशोधन पूरी तरह वैध है और तदाशा मिश्रा के बेदाग रिकॉर्ड, नक्सल विरोधी अनुभव तथा कड़क प्रशासनिक छवि को देखते हुए यह निर्णय लिया गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार इसे केंद्र का अनावश्यक हस्तक्षेप मान रही है।
वर्तमान में तदाशा मिश्रा पद पर बनी हुई हैं और नक्सलवाद, साइबर अपराध, संगठित अपराध तथा जन विश्वास बढ़ाने जैसे मुद्दों पर फोकस कर रही हैं।
बीजेपी और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर नियम तोड़ने का आरोप लगाया है। मरांडी ने तदाशा मिश्रा को खुद इस्तीफा दे देने की सलाह भी दी थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि मामला जल्द ही सुप्रीम कोर्ट या झारखंड उच्च न्यायालय में पहुंच सकता है। कई राज्यों (तमिलनाडु, तेलंगाना आदि) में इसी तरह के विवाद पहले भी देखे गए हैं। यह विवाद केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव तथा पुलिस महानिदेशक जैसे संवेदनशील पद की नियुक्ति में संवैधानिक प्रक्रिया बनाम राज्य की स्वायत्तता के टकराव को एक बार फिर उजागर कर रहा है।