वक्फ संशोधन बिल राज्यसभा में पारित: बढ़ेगा पारदर्शिता या सरकार का नियंत्रण?
लोकसभा में पारित होने के बाद वक्फ (संशोधन) विधेयक राज्यसभा में भी 128 के पक्ष और 95 के विरोध में पारित हो गया। बिल को लेकर सदन में तीखी बहस हुई, जिसमें सरकार ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम बताया, जबकि विपक्ष ने धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति अधिकारों पर हस्तक्षेप का आरोप लगाया।
सरकार का पक्ष:
अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरण रिजिजू ने स्पष्ट किया कि यह बिल धर्म नहीं, बल्कि वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है।
• अब वक्फ घोषित करने से पहले स्वामित्व का प्रमाण देना अनिवार्य होगा।
• इसका उद्देश्य वक्फ बोर्डों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है।
अमित शाह ने वक्फ के नाम पर की गई संपत्ति घोषणाओं पर सवाल उठाए, जिनमें मंदिरों की भूमि और सरकारी भवन भी शामिल हैं।
विपक्ष की आपत्तियाँ:
कांग्रेस के सैयद नसीर हुसैन ने कहा कि सरकार जानबूझकर भ्रम फैला रही है; जिन संपत्तियों का जिक्र हो रहा है, वे पहले से वक्फ हैं।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने चेतावनी दी कि यह बिल सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है और सरकार “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की नीति अपना रही है।
विवादास्पद प्रावधान:
• वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की अनिवार्यता।
• केवल 5 साल से इस्लाम मानने वाले ही वक्फ को संपत्ति दान कर सकते हैं।
• वक्फ संपत्ति विवाद अब वक्फ ट्रिब्यूनल की बजाय सरकारी अफसर तय करेंगे।
विपक्ष का तर्क है कि ये प्रावधान धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ हैं।
आगे की राह:
यह विधेयक अब राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। यह 1995 के वक्फ अधिनियम में बदलाव लाएगा।
विवाद के बीच यह सवाल बना हुआ है।क्या यह पारदर्शिता का प्रयास है या सरकार का वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण बढ़ाने की रणनीति?