नई दिल्ली, 11 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को समान नागरिक संहिता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि देश में UCC लागू करने का समय अब आ गया है, क्योंकि व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभाव और विषमताओं को दूर करने का सबसे प्रभावी तरीका यही है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस पर अंतिम फैसला विधायिका यानी संसद को ही लेना चाहिए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस आर. महादेवन की तीन सदस्यीय पीठ ने 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। याचिका में दावा किया गया था कि ये प्रावधान मुस्लिम महिलाओं के साथ उत्तराधिकार के मामलों में भेदभाव करते हैं।
पीठ ने कहा, “यदि हम शरियत की इन धाराओं को रद्द कर देते हैं, तो मुस्लिम समुदाय में संपत्ति बंटवारे के लिए कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं बचेगा, जिससे कानूनी शून्यता पैदा हो जाएगी।” जस्टिस बागची ने पूछा, “क्या इसे विधायी विवेक पर छोड़ना उचित नहीं होगा, ताकि संसद अनुच्छेद 44 के तहत UCC पर कानून बना सके?” सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “सभी महिलाओं को समान अधिकार देने का जवाब यूनिफॉर्म सिविल कोड ही है।”
कोर्ट ने याचिका को “बहुत मजबूत मामला” बताया, लेकिन व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का काम संसद पर छोड़ दिया। यह टिप्पणी UCC के समर्थकों के लिए उत्साहजनक है, क्योंकि कोर्ट ने पहले भी कई फैसलों में UCC की वकालत की है, लेकिन हमेशा इसे विधायी मामला माना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह टिप्पणी केंद्र सरकार पर UCC विधेयक लाने का दबाव बढ़ा सकती है। वर्तमान में उत्तराखंड में UCC लागू है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अभी कानून बनना बाकी है।
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सुप्रीम कोर्ट ने UCC पर दी मजबूत टिप्पणी: ‘समय आ गया है लागू करने का’
नई दिल्ली, 11 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को समान नागरिक संहिता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि देश में UCC लागू करने का समय अब आ गया है, क्योंकि व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभाव और विषमताओं को दूर करने का सबसे प्रभावी तरीका यही है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस पर अंतिम फैसला विधायिका यानी संसद को ही लेना चाहिए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस आर. महादेवन की तीन सदस्यीय पीठ ने 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। याचिका में दावा किया गया था कि ये प्रावधान मुस्लिम महिलाओं के साथ उत्तराधिकार के मामलों में भेदभाव करते हैं।
पीठ ने कहा, “यदि हम शरियत की इन धाराओं को रद्द कर देते हैं, तो मुस्लिम समुदाय में संपत्ति बंटवारे के लिए कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं बचेगा, जिससे कानूनी शून्यता पैदा हो जाएगी।” जस्टिस बागची ने पूछा, “क्या इसे विधायी विवेक पर छोड़ना उचित नहीं होगा, ताकि संसद अनुच्छेद 44 के तहत UCC पर कानून बना सके?” सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “सभी महिलाओं को समान अधिकार देने का जवाब यूनिफॉर्म सिविल कोड ही है।”
कोर्ट ने याचिका को “बहुत मजबूत मामला” बताया, लेकिन व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का काम संसद पर छोड़ दिया। यह टिप्पणी UCC के समर्थकों के लिए उत्साहजनक है, क्योंकि कोर्ट ने पहले भी कई फैसलों में UCC की वकालत की है, लेकिन हमेशा इसे विधायी मामला माना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह टिप्पणी केंद्र सरकार पर UCC विधेयक लाने का दबाव बढ़ा सकती है। वर्तमान में उत्तराखंड में UCC लागू है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अभी कानून बनना बाकी है।
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