रिपोर्ट: संतोष कुमार (@santoshrmg)
नई दिल्ली, 25 दिसंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी पेशे में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए सभी राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए कम से कम 30% प्रतिनिधित्व अनिवार्य कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने यह निर्देश देते हुए कहा कि यह आरक्षण “गैर-परक्राम्य” है और मौजूदा नियमों को “संशोधित मानते हुए” इसे लागू किया जाए।
इस साल के लिए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 20% सीटें महिलाओं के सीधे चुनाव से और 10% सीटें को-ऑप्शन से भरी जाएंगी। यह व्यवस्था उन राज्य बार काउंसिलों पर लागू होगी जहां चुनाव की अधिसूचना अभी जारी नहीं हुई है। छह राज्यों (आंध्र प्रदेश, पंजाब-हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, छत्तीसगढ़) में जहां चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, वहां तुरंत लागू नहीं होगा, लेकिन मतदाताओं से अपील की गई है कि वे महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व दें।
यह फैसला महिला अधिवक्ताओं योगमाया एम.जी. और शेहला चौधरी की जनहित याचिकाओं पर आया है, जिनमें बार काउंसिलों में महिलाओं की बेहद कम उपस्थिति (केवल 2% के करीब) पर चिंता जताई गई थी। वर्तमान में बार काउंसिल ऑफ इंडिया में एक भी महिला सदस्य नहीं है।
झारखंड पर विशेष प्रभाव:
झारखंड स्टेट बार काउंसिल में कुल 25 निर्वाचित सदस्य होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यहां करीब 7-8 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। झारखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में मौजूदा काउंसिल की सेवा विस्तार याचिका खारिज कर दी है, जिससे नए चुनाव जल्द होने की संभावना है। वर्तमान में झारखंड बार काउंसिल में एक भी महिला सदस्य नहीं है।
महिला वकीलों ने इस फैसले को “लैंगिक समानता की दिशा में विशाल छलांग” बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानूनी संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाएगा और निर्णय प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाएगा। बार काउंसिल ऑफ इंडिया को 8 दिसंबर तक अनुपालन की रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
यह फैसला संविधान की समानता की भावना को मजबूत करता है और कानूनी पेशे में महिलाओं की लंबी मांग को पूरा करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।