रिपोर्ट: संतोष कुमार (@santoshrmg)
रांची, 12 नवंबर 2025: झारखंड हाईकोर्ट ने स्पेशल मैरिज एक्ट , 1954 के तहत विवाह करने वाले व्यक्ति को धार्मिक या निजी कानून का सहारा लेकर दूसरी शादी करने से सख्ती से रोका है। जस्टिस सुजित नारायण प्रसाद और जस्टिस राजेश कुमार की खंडपीठ ने धनबाद के पैथॉलॉजिस्ट डॉ. मोहम्मद अकील आलम की अपील खारिज करते हुए देवघर फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
डॉ. अकील आलम ने 4 अगस्त 2015 को SMA के तहत दूसरी शादी की थी, जबकि उनकी पहली पत्नी जीवित थीं और उनसे दो बेटियाँ हैं। विवाह पंजीकरण के समय उन्होंने यह तथ्य छिपाया। शादी के दो महीने बाद पत्नी ने घर छोड़ दिया और आरोप लगाया कि अकील ने संपत्ति हस्तांतरण के लिए दबाव बनाया और मारपीट की।
फैमिली कोर्ट ने दूसरी शादी को अवैध घोषित कर अकील की वैवाहिक अधिकार बहाली की याचिका खारिज की। हाईकोर्ट ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4(ए) स्पष्ट है- विवाह तभी वैध जब कोई पक्षकार पहले से जीवित जीवनसाथी न रखता हो। यह कानून ‘नॉन ऑब्स्टांटे क्लॉज’ के तहत किसी भी धार्मिक कानून से ऊपर है।
कोर्ट ने अकील के मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत चार शादियों के दावे को खारिज करते हुए कहा, “स्पेशल मैरिज एक्ट अपनाने पर संबंध पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष कानून से शासित होते हैं।” यह फैसला बिगैमी पर अंकुश और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करेगा।