रांची, 16 फरवरी 2026: झारखंड हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की मजबूती से रक्षा करते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि बेटा और बहू द्वारा माता-पिता को मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना दी जा रही हो, तो वे उनके स्व-अर्जित मकान में जबरन नहीं रह सकते। ऐसे मामलों में बुजुर्ग दंपति को अपनी संपत्ति में शांति से रहने का पूरा अधिकार है और बेटे-बहू को घर खाली करना होगा।
न्यायमूर्ति राजेश कुमार की एकल पीठ ने 10 फरवरी 2026 को यह महत्वपूर्ण आदेश दिया। मामले में रामगढ़ के 75 वर्षीय लखन लाल पोद्दार और उनकी 72 वर्षीय पत्नी उमा रानी पोद्दार ने याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उनका बेटा जीतेंद्र पोद्दार और बहू रितु पोद्दार उनके स्व-अर्जित मकान में रहते हुए उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं, जिससे उनकी जिंदगी नर्क बन गई है।
अदालत ने रामगढ़ के उपायुक्त द्वारा 23 फरवरी 2024 को पारित अपील आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बेटे-बहू को कुछ राहत दी गई थी। हाईकोर्ट ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम 2007 का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून बुजुर्गों की संपत्ति और सम्मान की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, न कि प्रताड़ना को वैध बनाने के लिए।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, “जीवन के अंतिम चरण में बुजुर्गों को शांति और सुरक्षा की जरूरत होती है। यदि बेटा-बहू के साथ सह-अस्तित्व संभव नहीं है, तो कानून के अनुसार घर बुजुर्गों के पास ही रहेगा। बेटे-बहू का संपत्ति पर दावा केवल उत्तराधिकार के माध्यम से हो सकता है, न कि जबरन कब्जे से।”
यह फैसला राज्य में बढ़ते पारिवारिक विवादों के बीच बुजुर्गों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। कई अन्य हाईकोर्ट्स ने भी इसी तरह के फैसले दिए हैं कि विवाहित बेटा-बहू माता-पिता की सहमति के बिना स्व-अर्जित संपत्ति में नहीं रह सकते, और प्रताड़ना साबित होने पर बेदखली का आदेश दिया जा सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की भावना को मजबूत करता है और परिवारों में बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी की याद दिलाता है।