नीट-पीजी 2025-26 की कट-ऑफ पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: डॉक्टरों की चिंता बढ़ी

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नई दिल्ली: मेडिकल शिक्षा में योग्यता मानकों को लेकर बड़ा विवाद छिड़ गया है। नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज ने नीट-पीजी 2025-26 के लिए कट-ऑफ को शून्य और नेगेटिव स्कोर तक घटा दिया है, ताकि काउंसलिंग के बाद बची 18,000 से अधिक पोस्टग्रेजुएट सीटों को भरा जा सके। 13 जनवरी 2026 को जारी अधिसूचना में जनरल/ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के लिए 7वें प्रतिशतक (103 अंक), जनरल पीडब्ल्यूडी के लिए 90 अंक, और ओबीसी/एससी/एसटी के लिए नेगेटिव (-40 अंक) तक की छूट दी गई। इससे तीसरे राउंड की काउंसलिंग में अधिक उम्मीदवार योग्य हो सकें।

इस फैसले के खिलाफ 16 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई। याचिकाकर्ता डॉ. लक्ष्य मित्तल (यूडीएफ अध्यक्ष), डॉ. आकाश सोनी (फाइमा) और अन्य ने इसे असंवैधानिक बताया। उनका तर्क है कि शून्य/नेगेटिव स्कोर वाले उम्मीदवारों को स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग देने से मेरिट सिस्टम कमजोर होगा, मरीजों की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी और मेडिकल प्रोफेशन की गुणवत्ता प्रभावित होगी। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है, साथ ही एनएमसी एक्ट 2019 के न्यूनतम मानकों का भी।

याचिका डायरी नंबर 3085/2026 के तहत दाखिल है, जिसमें अधिसूचना रद्द करने की मांग की गई। फोर्डा ने स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से फैसला वापस लेने का आग्रह किया। मामला अभी सुनवाई के लिए लिस्ट नहीं हुआ, लेकिन मेडिकल समुदाय में बहस तेज है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे सर्जरी-मेडिसिन जैसे क्षेत्रों में ट्रेनिंग की गुणवत्ता गिर सकती है, जो स्वास्थ्य सेवा को प्रभावित करेगी। देश में डॉक्टरों की कमी के बीच यह मुद्दा महत्वपूर्ण है।