केंद्र सरकार ने वोटर आईडी को आधार से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया है। इस संबंध में चुनाव आयोग और यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (UIDAI) की बैठक हुई, जिसमें इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई। सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया मौजूदा कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप होगी।
चुनाव आयोग का तर्क
चुनाव आयोग के अनुसार, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत मतदान का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को दिया गया है। आधार कार्ड केवल पहचान का प्रमाण होता है, इसलिए वोटर आईडी को आधार से जोड़ने की प्रक्रिया सभी कानूनी प्रावधानों के तहत होगी।
सरकार ने संसद में जानकारी दी थी कि आधार-वोटर कार्ड लिंकिंग की प्रक्रिया पहले से चल रही है, लेकिन इसके लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की गई है। साथ ही, जो लोग अपने आधार को वोटर आईडी से नहीं जोड़ते, उनके नाम मतदाता सूची से नहीं हटाए जाएंगे।
निर्वाचन आयोग की रणनीति
चुनाव आयोग का कहना है कि आगामी चुनावों में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। इस मुद्दे पर निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO), जिला चुनाव अधिकारियों (DEO) और मुख्य चुनाव अधिकारियों (CEO) के साथ बैठकें होंगी।
इसके लिए पहली बार पिछले 10 वर्षों में चुनाव आयोग ने सभी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों और संबंधित अधिकारियों से सुझाव मांगे हैं। अप्रैल 2025 से पहले इस पर रायशुमारी की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
2015 में चुनाव आयोग ने 30 करोड़ से अधिक वोटर आईडी को आधार से लिंक करने का प्रयास किया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। यह मामला तब उठा था जब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में करीब 55 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि आधार को अनिवार्य रूप से वोटर आईडी से जोड़ने की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठ सकते हैं। इसी कारण यह प्रक्रिया रोक दी गई थी।
आगे की राह
अब चुनाव आयोग कानूनी रूपरेखा के भीतर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखते हुए ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
इस तरह, यह मुद्दा न सिर्फ चुनाव सुधारों से जुड़ा है बल्कि संवैधानिक और कानूनी चुनौतियों से भी। आने वाले समय में इस पर और अधिक चर्चा होने की संभावना है।